
जेलरोड (तिहाड़ जेल), नई दिल्ली: आप माने अथवा नहीं, आपकी मर्जी। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में रहने वाली आर्थिक-सामाजिक-सांस्कृतिक-शैक्षिक-बौद्धिक रूप से ‘गरीबी की रेखा से बहुत नीचे रहने वाली महिलाएं, चाहे वे अपराधी हों अथवा नहीं, चाहती हैं कि उनका प्रसव पीड़ा ऐतिहासिक तिहाड़ कारावास के चहारदीवारी के अंदर हो। वे आज़ादी के 11-वर्ष बाद अपने अस्तित्व में आये दिल्ली सल्तनत के केंद्रीय कारावास के दीवारों के बीच अपना प्रसव पीड़ा महसूस करना चाहती हैं।
@अखबारवाला001 (233) ✍ दिल्ली के तिहाड़ कारावास में वह सब कुछ होता है जो कारावास में नहीं होनी चाहिए 😢
वे चाहती हैं कि उनके बच्चे की पहली किलकारी जेल के अंदर दीवारों से टकराए। उन्हें विश्वास है कि वह बच्चा उनके और उनके परिवार के जीवन में नई रोशनी लेकर आएगा। और इसके लिए वे सभी प्रकार की यातनाओं को सहने के लिए सज्ज होती है – ताकि वे कारावास के अंदर प्रवेश कर लें। वे विभिन्न प्रकार की छोटी-मोटी अपराधों में भी स्वयं को सम्मिलित करना पसंद करती हैं ताकि प्रशासनिक अधिकारी और पुलिस उन्हें तिहाड़ के अंदर बंद कर दे पेट में पलते बच्चों के साथ।
यह तो बच्चे की बात हुई। न केवल राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली, बल्कि भारत के कोने-कोने में रहने वाले विद्वान, विदुषी, अधिकारी, पदाधिकारी, संत, महात्मा, नेता, अभिनेता, ठेकेदार, जमादार, डाक्टर, वकील, न्यायमूर्ति, मंत्री, संत्री यानी सभी तबके के लोग प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से तिहाड़ कारावास के अंदर अधिकारियों को निहोरा-विनती करने में तनिक भी कोताही नहीं करते कि एक सांझ के लिए ही सही, उन्हें जेल का खाना उपलब्ध कराया जाए ।
एक घंटे के लिए ही सही, उन्हें जेल के अंदर प्रवेश कर झाड़ू-पोछा, बर्तन-बासन करने की अनुमति दी जाए – स्वेच्छा से । उन्हें कारावास परिसर की मिट्टी उपलब्ध करायी जाए । उन्हें उस लकड़ी का छोटा-से-छोटा हिस्सा प्रदान किया जाए जिस पर कैदियों को फांसी दी गयी थी। यह सभी सेवाओं और वस्तुओं की मांग इसलिए होती है कि उन्हें विश्वास है कि ये सभी वस्तुएं उनके जीवन में संकट मोचक के रूप में कार्य करेंगे। इसे ही कहते हैं ‘विश्वास’ और ऐसे विश्वास ‘भय’ से ही उत्पन्न होते हैं। खैर।
विगत दिनों पश्चिम बंगाल के एक कारावास में जब एक महिला प्रसव पीड़ा से गुजरी और बच्चे को जन्म दी, यह खबर स्थानीय अख़बारों से लेकर प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर के पत्र-पत्रिकाओं में अपना स्थान सुरक्षित किया। शायद ही कोई क्षेत्र बचा होगा, जहाँ उस महिला के प्रसव पीड़ा से सम्बंधित समाचार प्रकाशित नहीं हुए थे। उस समाचार की मुख्य बात यह थी की जब वह महिला कारावास में आयी थी, वह गर्भवती नहीं थी।

सवाल उठना स्वाभाविक था कि महिला गर्भवती कैसे हो गई? इस घटना के जांच के बाद यह ज्ञात हुआ कि सिर्फ यही महिला नहीं, बल्कि पश्चिम बंगाल के विभिन्न जेलों में विगत एक वर्षों में लगभग 196 महिलाओं को प्रसव पीड़ा हुआ और वे बच्चों को जन्म दी। यह सभी महिलाएं जब जेल आयी थी, गर्भ से नहीं थी’ – आखिर इन बच्चों के पिता कौन है? पिता कैसे बने? फिर शुरू हुआ राजनीतिक आरोप और प्रत्यारोप। कलकत्ता हाई कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश की पीठ के तहत एक जनहित याचिका दायर की गई है। यह मामला सिर्फ बंगाल ही नहीं, अगर देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के कारावासों को एक वृहद् शोध के अधीन रखा जाए तो न जाने शोध के अंतिम अध्याय में क्या-क्या लिखा जायेगा। जेल में इस तरह से बच्चों का पैदा होना चिंता का विषय है। हाईकोर्ट ने संज्ञान लेते और हैरानी जताते हुए कहा कि जेल में रहने के दौरान महिला कैदी गर्भवती हो रही हैं, जिसके बाद जेलों के अंदर बच्चे पैदा हो रहे हैं।
उधर सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह की पीठ ने इस मुद्दे पर गंभीरता दिखाते हुए स्वतः संज्ञान लिया और सभी राज्यों से इस मामले पर तुरंत कार्रवाई का आदेश दिया। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो की दिसंबर 2023 में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत की कुल 1330 जेलों में कुल 5 लाख 73 हजार 220 कैदी बंद हैं. इनमें 23 हजार 772 महिलाएं हैं। इनमें से 1537 महिलाएं ऐसी हैं, जिनके बच्चे उनके साथ जेलों में रहते हैं। इसमें आधी संख्या ऐसी महिला कैदियों की है, जिन्होंने जेल में ही रहते हुए बच्चे को जन्म दिया है। गनीमत है कि इन सभी बच्चों के जन्म प्रमाण पत्र में जेल का जिक्र नहीं किया। वैसे आकंड़ों के मुताबिक भारत में प्रत्येक घंटे 2651 बच्चे जन्म लेते हैं। खैर।
बहरहाल, ‘मदर्स एंड बेबीज़ इन प्रिज़न’ से सम्बंधित एक अंतर्राष्ट्रीय रिपोर्ट में कहा गया है ‘जेल शिशुओं और छोटे बच्चों के लिए उपयुक्त वातावरण प्रदान नहीं करता है, जिससे अक्सर दीर्घकालिक विकास संबंधी मंदता होती है। फिर भी, यदि शिशुओं और बच्चों को जबरन उनकी माताओं से अलग कर दिया जाता है, तो उन्हें स्थायी भावनात्मक और सामाजिक क्षति होती है।
अधिकांश यूरोपीय जेल प्रणालियाँ शिशुओं को माताओं के साथ रहने के लिए कुछ स्थान प्रदान करती हैं, लेकिन फिर भी कई सैकड़ों शिशुओं को उनकी कैद माताओं से अलग कर दिया जाता है। इस रिपोर्ट में तर्क दिया गया है कि छोटे बच्चों की उन कुछ माताओं के लिए एक नए दृष्टिकोण की आवश्यकता है जो गंभीर अपराध करती हैं और जो समुदाय के लिए खतरा पैदा करती हैं, और छोटे बच्चों वाली महिला अपराधियों की भारी संख्या को समुदाय में प्रबंधित किया जाना चाहिए।’
अंतरराष्ट्रीय संदर्भ में भी अक्सर यह सिफारिश की जाती है कि गर्भवती महिला जेल के बाहर किसी अस्पताल में (बिना हथकड़ी के) अपने बच्चे को जन्म दे सके। जन्म का स्थान एक सामान्य अस्पताल होगा। उसके बाद जेल में बच्चे को अपनी माँ के साथ लंबे समय तक रहने के लिए अच्छी सुविधाएं होनी चाहिए, जब तक उसे अपनी माँ की शारीरिक देखभाल की आवश्यकता हो।

ये सुविधाएं विभिन्न देशों में अलग-अलग होती हैं। अन्य स्थितियों में माताएं अपने और अपने बच्चों के लिए एक छोटा सा घर बनाने की कोशिश करती हैं, उन्हें अक्सर सेल साझा करना पड़ता है, जहाँ वे कुछ छोटे-मोटे भोजन भी पकाती हैं । अन्य अधिक ‘प्रगतिशील’ जेलों में, बच्चे शाम और रात के समय अपनी माताओं के साथ रहते हैं, जबकि वे दिन के समय जेल के अंदर या बाहर नर्सरी में जाते हैं, जबकि माँ काम कर रही होती है।
यह स्वयंसिद्ध है कि बच्चों को जेल में जन्म नहीं लेना चाहिए और काउंसिल ऑफ यूरोप के सदस्य देशों में सामान्य प्रथा यह है कि उचित समय पर गर्भवती महिला कैदियों को बाहरी अस्पतालों में स्थानांतरित कर दिया जाता है। फिर भी, समय-समय पर, ऐसे उदाहरण मिलते हैं जहाँ गर्भवती महिलाओं को स्त्री रोग संबंधी जांच और/या प्रसव के दौरान बेड या फर्नीचर के अन्य सामान से बाँध दिया जाता है या अन्यथा उन्हें बांध दिया जाता है।
ऐसा दृष्टिकोण पूरी तरह से अस्वीकार्य है, और निश्चित रूप से इसे अमानवीय और अपमानजनक व्यवहार माना जा सकता है। जेल में बंद कई महिलाएं बच्चों या अन्य लोगों की प्राथमिक देखभाल करने वाली होती हैं, जिनके कल्याण पर उनके कारावास का प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इस संदर्भ में एक विशेष रूप से समस्याग्रस्त मुद्दा यह है कि क्या – और यदि हाँ, तो कितने समय तक – शिशुओं और छोटे बच्चों को अपनी माताओं के साथ जेल में रहना संभव होना चाहिए। यह एक कठिन प्रश्न है, क्योंकि एक ओर, जेल स्पष्ट रूप से शिशुओं और छोटे बच्चों के लिए उपयुक्त वातावरण प्रदान नहीं करते हैं, जबकि दूसरी ओर, माताओं और शिशुओं को जबरन अलग करना अत्यधिक अवांछनीय है।
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सभी मामलों में शासकीय सिद्धांत बच्चे का कल्याण होना चाहिए। इसका तात्पर्य विशेष रूप से यह है कि हिरासत में प्रदान की जाने वाली कोई भी प्रसव-पूर्व और प्रसवोत्तर देखभाल बाहरी समुदाय में उपलब्ध देखभाल के बराबर होनी चाहिए। जहां शिशुओं और छोटे बच्चों को हिरासत में रखा जाता है, उनके उपचार की देखरेख सामाजिक कार्य और बाल विकास के विशेषज्ञों द्वारा की जानी चाहिए।
यह सुनिश्चित करने के लिए भी व्यवस्था की जानी चाहिए कि जेल में बंद शिशुओं की हरकत और संज्ञानात्मक कौशल सामान्य रूप से विकसित हों। विशेष रूप से, उन्हें जेल के भीतर पर्याप्त खेल और व्यायाम की सुविधाएँ मिलनी चाहिए और जहाँ भी संभव हो, उन्हें जेल से बाहर निकलकर इसकी दीवारों के बाहर सामान्य जीवन का अनुभव करने का अवसर मिलना चाहिए। जहाँ यह संभव नहीं है, वहाँ क्रेच-प्रकार की सुविधाओं तक पहुँच प्रदान करने पर विचार किया जाना चाहिए। ऐसी व्यवस्था से महिला कैदियों को जेल के अंदर काम और अन्य गतिविधियों में अधिक हद तक भाग लेने में मदद मिलेगी, जो अन्यथा संभव नहीं हो पाता।’

स्वीडन में, शिशुओं को जेल में शायद ही कभी स्वीकार किया जाता है, लेकिन उन्हें एक वर्ष तक के लिए रखा जा सकता है और औसतन तीन महीने तक का समय लगता है। जर्मनी में, छह बंद जेल हैं जो तीन वर्ष तक के बच्चों को अनुमति देते हैं, और दो खुली जेलें हैं जो छह वर्ष की आयु तक के बच्चों को अनुमति देती हैं। नीदरलैंड में, बच्चे अपने चौथे जन्मदिन तक आधी खुली जेल टेर पील में रह सकते हैं। माँ-बच्चे की इकाई एक अलग घर में स्थित है, लेकिन जेल क्षेत्र के भीतर, चार माताओं और चार बच्चों के लिए। पाँच बंद जेलों में बच्चे नौ महीने तक रह सकते हैं। आइसलैंड में, केवल बहुत छोटे बच्चे जो स्तनपान कर रहे हैं या जिनकी विशेष ज़रूरतें हैं, वे जेल में रह सकते हैं। पुर्तगाल और स्विट्जरलैंड तीन साल तक के बच्चों को, फ़िनलैंड दो साल तक के बच्चों को जेल में रहने की अनुमति देता है। डेनमार्क में पुरुष और महिला कैदियों को अपने बच्चों को साथ रखने की अनुमति है, बशर्ते कि उन्हें बच्चे के तीन साल का होने तक रिहा किया जाना हो, लेकिन व्यवहार में बहुत कम बच्चे जेल में रखे जाते हैं। इंग्लैंड और वेल्स में, तीन बंद जेलों में 34 बच्चों के लिए जगह है, और एक खुली जेल में 20 बच्चों के लिए जगह है। बच्चे खुली जेल और एक बंद जेल में 18 महीने की उम्र तक रह सकते हैं, अन्यथा सीमा नौ महीने है।
पश्चिमी देशों में, मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से, बच्चे के अपनी माँ के साथ जेल में रहने की अवधि को अक्सर लगाव सिद्धांत द्वारा उचित ठहराया जाता है, हालांकि एक आधुनिक दृष्टिकोण में छोटे बच्चे को अपनी जैविक माँ से जुड़ना ज़रूरी नहीं है। इसलिए, यदि कोई पर्याप्त विकल्प (जैसे पिता, दादी या पालक माता-पिता) है, तो बच्चा उस जेल से बाहर रह सकता है जहाँ उसकी माँ को हिरासत में रखा गया है। लेकिन इटली में, घर के माहौल में माँ-बच्चे के लगाव को इतना महत्वपूर्ण माना जाता है कि तीन साल से कम उम्र के बच्चों वाली माताओं को कैद नहीं किया जाता है, बल्कि उन्हें घर में नज़रबंद रखा जाता है। जब तक बच्चा दस साल का नहीं हो जाता, तब तक वे जेल के बाहर एक वैकल्पिक कार्यक्रम का पालन करते हैं।
आइये, दिल्ली के तिहाड़ जेल चलते हैं। द्वापर युग में जब जेल में जन्माष्टमी पर माता देवकी ने भगवान कृष्ण को जन्म दिया था, तो लोगों ने कामना की थी कि भविष्य में फिर कोई गर्भवती महिला जेल में न जाए और इस तरह से कठिनाईयों के बीच बच्चे को जेल में जन्म न दे। मगर, आज कलियुग में इस तरह की घटना की बार-बार पुनरावृति होती है। अपराध में लिप्त बहुत सी गर्भवती महिलाएं जेल में जाती हैं और जेल में ही बच्चों को जन्म देती हैं। जन्म लेने वाले अबोध मासूम मां की कोख रूपी कैद से आजाद होकर दुनिया में तो आते हैं, मगर मां के साथ जेल में ही कैद होकर रह जाते हैं। जेल में जन्म लेने वाले ऐसे अभागे मासूम अपने बचपन के कुछ शुरुआती साल मां की सजा जेल में ही मां के साथ रहकर काटते हैं।

कानूनन बच्चे की उम्र छह साल की होने तक उसे उसकी मां से अलग नहीं किया जा सकता। यही, कारण है कि तिहाड़ जेल में जन्म लेने वाले बच्चों को उनकी मां के साथ ही जेल में रहना होता है। छह साल की उम्र होने के बाद कानून के अनुसार बच्चों को मां से अलग कर उसे महिला कैदी के परिजनों के पास भिजवा दिया जाता है। जिससे कि वह अपनी पढ़ाई पूरी कर सके। जेल में जन्मे बच्चों की जरूरतों को पूरा करने के लिए तिहाड़ जेल में एक अलग विंग काम करता है। यह बच्चों के लिए खिलौने, झूले व खाने-पीने की अन्य वस्तुओं की पूर्ति करता है।
जेल प्रशासन द्वारा इस बात का ध्यान रखा जाता है कि बच्चे को मां के साथ रहते हुए कैद में होने का अहसास न हो। उसे ऐसा लगे कि वह अपने घर पर है। इसके अतिरिक्त जेल में बच्चों की प्रारंभिक शिक्षा की व्यवस्था की जाती है। अगर किसी महिला कैदी के बच्चे की जिम्मेदारी लेने वाला कोई परिजन नहीं होता तो ऐसे बच्चों का दाखिला बोर्डिग स्कूल में स्वयं सेवी संस्थाओं के माध्यम से कराया जाता है।
कुछ वर्ष पूर्व मंडल कारा, बांका (झारखण्ड) में बंद महिला कैदी खुशबू खातून सदर अस्पताल में बच्चे को जन्म दी थी। प्रसव पीड़ा होने पर अस्पताल में भर्ती कराया गया था। खातून करीब दो माह से जेल में बंद है। उसपर हत्या का आरोप है। उधर, बिहार ही नहीं देश के अन्य राज्यों में भी सम्बंधित अधिकारी जेल प्रशासन को आदेश दिए हैं कि जेल में रहने वाले अथवा जन्म लिए बच्चों को यह महसूस न हो कि वह जेल में है । अधिकारी पत्र भेज कर जेल में बंद महिला कैदी के बच्चे का जन्म दिन मनाने का आदेश दिया।
इतना ही नहीं, बिहार के जहानाबाद जेल में 19 ऐसे बेगुनाह मासूम थे/हैं, जिनका बचपन गुनहगार मां की ममता और आंचल की छांव पाने के लिए सलाखों के पीछे गुजर रहा था/है। ये सभी महिलाएं दहेज प्रताड़ना, दहेज हत्या, मारपीट और शराब बिक्री मामले में जेल में बंद थी। 2022 में शराब बेचने के आरोप में जहानाबाद व अरवल जिले में 514 लोगों की गिरफ्तारी हुई थी, जिसमें 70 प्रतिशत महिलाएं हैं। इनमें तीन महिलाओं की गोद में उनका मासूम बच्चा भी था। मजबूरन अपने साथ मासूम को भी जेल ले जाना पड़ा।

विगत दिनों तिहार कारावास के पूर्व जेलर सुनील कुमार गुप्ता जी से मुलाक़ात हुई। गुप्ता साहब अपनी जिंदगी का आधा से अधिक हिस्सा तिहाड़ को दिए है। अब तक के जीवन में उन्होंने जो सांसे ली है, उसमें आधी से अधिक सांसे तिहाड़ जेल के अंदर की हवाओं की है। वे तिहाड़ कारावास के अंदर करीब 35 वर्ष सेवा किये हैं। खूंखार से खूंखार कैदियों से लेकर, फांसी पर लटकने वाले, लटकाये जाने वाले दर्जनों कैदियों का चश्मदीद गवाह बने हैं। तिहाड़ के अंदर रहने विभिन्न मामलों में बंद महिलाओं की कथा-व्यथा को महसूस किये हैं। नीचे के छोटे कर्मचारियों से लेकर ऊँची-ऊँची कुर्सियों पर बैठे बड़े-बड़े अधिकारियों से रूबरू हुए हैं जिनका पदस्थापन तो कारावास और कैदियों की दशा को सुधारने हेतु हुआ था, लेकिन समयांतराल (अपवाद छोड़कर) सभी भ्रष्टाचार की दरिया में गोंता लगाने लगे, बहने लगे।
गुप्ता साहब दर्जनों ऐसे अधिकारियों का चश्मदीद गवाह बने जिसमें कुछ ने तो कारावास के नियमों को दांत से पकड़कर रखा, कुछ नियमों को दंतहीन बना दिए। उन्हीं सब बातों में कारावास में प्रसव पीड़ा और बच्चों का जन्म भी एक थी।
गुप्ता जी कहते हैं कि “स्त्रियों की पुत्र जन्म सुनिश्चित करने हेतु जानबूझ का गिरफ्तार होकर जेल पहुँचने की यह प्रवृति हमें किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं थी, क्योंकि वह पुत्रियों के विरुद्ध प्राचीन काल की पक्षपाती प्रथा को बढ़ावा देती थी। जेल में पुत्र जन्म से सम्बंधित स्त्रियों का विश्वास इतना मजबूत था कि वे अपनी गर्भावस्था के अंतिम कुछ दिनों में कुछ छोटे मोटे झगड़ों या चोरी करने के अपराध के बहाने जेल पहुँच जाती थी। उनकी पुत्र प्राप्ति की लालसा उन्हें इस अतिरिक्त उपाय को आजमाने हेतु बाध्य करती थी। हमें वहां से बाहर निकालने की चुनौती का सामना करना पड़ता था। हम उन्हें किस भांति समझने वाले थे? हमारे पास क्या वास्तव में उन्हें सच्चाई बताकर जागरूक करने के अतिरिक्त कुछ अन्य करने योग्य नहीं था। वास्तव में, वह इतना सरल नहीं था कि वहां प्रसव के बहाने जेल आने वाली स्त्रियां अधिकतर निम्न आयवर्ग परिवार वाली होती थी और बहुत काम शिक्षित होती थी। हमने उसके आंकड़ों को झुग्गी बस्तियों और जेल के निकटस्थ अन्य क्षेत्रों की दफ़ीवारों पर चिपका दिया परन्तु हमें अपेक्षित परिणाम प्राप्त नहीं हुआ।”
गुप्ता जी कहते हैं कि “वहां एक ऐसा भी अन्धविश्वास था (होगा भी) जिसका जेल के अधिकारियों के रूप में हमने सक्रीय तौर पर सामना करने का प्रयास किया। साल 2001 में हमने पाया कि तिहाड़ में पैदा होने वाले बच्चों की संख्या में वृद्धि हो रही है। चूँकि मैं वार्षिक आंकड़े तैयार कर रहा था, जेल में उस समय काम से काम 50 ऐसी स्त्रियां थी, जो गर्भवती थी। अनेक मामलों में स्त्रियां जमानत हेतु आवेदन करती और शिशु जन्म के बाद वहां से चली जाती थी। हमारा प्रारंभिक अनुमान यह था कि बच्चे के जन्म से पहले वे स्त्रियां इसलिए गिरफ्तार होना चाहती थीं क्योंकि वे जेल के उत्तर प्रसव सुविधाओं का लाभ उठाना चाहती थी। यदि आप गरीब थीं तो आपके लिए जेल में होना एक अच्छा विकल्प था, क्योंकि उसका अर्थ यह था आपको नियमित भोजन मिलेगा और आपकी चिकित्सा आवश्यकताओं का भी पूरा ध्यान रखा जायेगा। एक और जहाँ हमारी सुविधाएँ बहुत आकर्षक नहीं थीं, वहीँ निर्धन कैदियों के लिए तिहाड़ के बाहर मुलभुत चिकित्सा सुविधाएँ भी उनकी पहुँच से कोसों दूर थीं।”

इतना ही नहीं, “जब मैंने इन स्त्रियों से साथ बात की तो मुझे दूसरी ही बात पता चली कि वे तिहाड़ में इतनी बड़ी तरह क्यों बानी रहने के इक्षुक थीं। उनमें से अनेक स्त्रियों को इस बात का विश्वास था की जेल में प्रसव कराने से पैदा होने वाला बच्चा लड़की के बजाय लड़का ही पैदा होगा। स्पष्टतया उनके इस विश्वास की जेड भगवान्भ श्रीकृष्ण के जन्म से पोषित थीं। हिंदी धर्मग्रंथों के अनुसार, देवकी को उनके पति बासुदेव के साथ भाई राजा कंस ने कारागार में दाल दिया था, क्योंकि वह जानता था कि देवकी के किसी पुत्र के हाथों उसकी मृत्यु होने वाली थी। क्रूर कंस ने देवकी के बच्चों की हत्या करने की व्यवस्था तो कर ली थी, परन्तु जब भगवान्भ विष्णु ने कृष्ण के रूप में अपना दूसरा अवतार लिया और इनके आठवें पुत्र के रूप में जन्म लिया तो वासुदेव ने स्वयं को बेड़ियों से मुक्त पाया और वह शिशु को नन्द और यशोदा के घर छोड़ने आये तथा वहां से अपने साथ एक कन्या को ले आये। इस प्रकार कृष्ण जीवित बच गए और किवदंती के अनुसार कंस का वध हुआ।”
गुप्ता जी कहते हैं: “कारागार के भोजन के अतिरिक्त जेल के अन्य वस्तुओं को भी शांतिदायी शक्तियों से से ओत प्रोत माना जाता है। फांसी के तख्ते में प्रयोग की गयी लड़की की अत्यधिक मांग थी, क्योंकि उसे संकट मोचक माना जाता था। कुछ लोगों का विश्वास था कि ऐसी लकड़ी के टुकड़े को बच्चे के शयनकक्ष में रखने से उसकी या उसके मन से भय दूर करने की सहायता मिलेगी और वह बिस्तर गिला करना बंद कर देगी या देगा। वह किसी बच्चे को परीक्षा के भय से भी मुक्ति कर सटी है। अनेक संत फ़क़ीर भी जेल की मिट्टी से बने ताबीज बेचते थे, क्योंकि ऐसा माना जाता था कि उसमें असाधारण शक्तियां होती थी। जब भी कभी कोई तिहाड़ की मिटटी या पानी की मांग करता था, हम उसकी मांग मान लेते थे और सिपाही उसके साथ जाकर उन वस्तुओं की व्यवस्था का देता था।”

“कुछ लोगों का विश्वास है कि यदि आप बड़े दौर से गुजर रहे हैं और जीवन में दुर्भाग्य का अनुभव कर रहे हैं तो आपको उसे दूर करने के लिए केवल इतना करना है की आप जेल की रसोई में बना खाना खा लें। इसके लिए एक संभव दलील यह है की तिहाड़ का घृणित खाना खाने के बाद आपकी समस्त व्यथाएँ समाप्त हो जाएगी। लेकिन मैं यह बात गंभीरता पूर्वक कह रहा हूँ कि मेरे पास अपने दोस्तों, वकीलों और यहाँ तक कि उच्च न्यायालय के अनेक जजों के फोन आये थे, जो चाहते थे कि मैं उनके लिए तिहाड़ में बने भोजन का प्रबंध करूँ, ताकि उनका अपना जीवन अधिक सुखमय हो सके। अनेक अन्य ऐसे लोग भी थे, जिन्होंने जेल की खाने की मांग इसलिए की, क्योंकि उनकी कुंडली में साफ़ लिखा था कि उन्हें किसी बिंदु पर अपने जीवन में कुछ समय जेल में गुजरना होगा। अपने इस पूर्व निर्धारित दुर्भाग्य से छुटकारा पाने के लिए वे मुझसे पूछते थे कि क्या वे एक रात जेल में गुजार सकते थे, या जेल का खाना खा सकते थे? यह उपाय सम्भवतः लाल किताब में वर्णित है, जो कुछ लोगों के लिए बाइबल जैसे होती है।
बहरहाल, यह देखकर बड़ा विचित्र लगता है कि सुशिक्षित व्यक्तियों भी अपने अन्धविश्वास के समक्ष अपने तार्किक मन की बात को ठुकरा देता है। अनेक न्यायधीशों के अलावा एक बैंक के अधिकारी भी थीं जिन्हे अपने काम में कठिनाइयों का सामना करना पर रहा था। उन्होंने किसी से सलाह ली और उन्हें गुप्ता जी से मिलने को कहा गया ,वे मिलने आ गई। गुप्ता जी उन्हें तत्काल खली हाथ नहीं लौटा सके । वह महिला तीन बार आयी और वह वहां न केवल जेल का खाना खाया, बल्कि जेल के अंदर फर्नीचरों, आलमारियों की सफाई की, कमरे में झाड़ू भी लगाई थी।
क्रमशः ……..