
राजनगर / दरभंगा / पटना : आज ही नहीं, आने वाले समय में जब बिहार प्रान्त के, खासकर मिथिलाञ्चल के बच्चों, नौजवानों से, पूछा जायेगा की दरभंगा के अंतिम राजा कौन थे? तो सभी ‘दाहिने-बाएं’ देखने लगेंगे या फिर गर्दन घुमा कर गुगल करेंगे। अगर संघ लोक सेवा आयोग द्वारा संचालित भारतीय प्रशासनिक सेवा के अन्तर्वीक्षा में टेबुल के दूसरे तरफ बैठे महानुभाव सामने बैठे अभ्यर्थी से पूछेंगे कि दरभंगा का लाल किला और राजनगर (अब मधुबनी जिला) में वह ऐतिहासिक नौलक्खा भवन किसने बनवाया था? तो अभ्यर्थी मुस्कुराते कहेंगे: ‘सर!! अब तो न लाल किला है और ना ही नौलक्खा….. सुनते हैं महाराजाधिराज की मृत्यु के बाद मिथिलाञ्चल की समस्त धरोहर दरभंगा राज की पारिवारिक राजनीति और संपत्ति पर आधिपत्य बनाने के चक्कर में औने-पौने भाव में बिक गयी। पढ़ने में, सुनने में अटपटा लग रहा होगा, बुरा भी लग रहा होगा, परन्तु जब आराम से सोचेंगे तो “यथार्थ” लगने लगेगा।
आंकड़ों के अनुसार देश में तकरीबन 3645 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर हैं। अगर औसतन भारतीयों से पूछा जाय की वे अपने ही राज्य में स्थित न्यूनतम 10 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहरों का नाम बताएं, तो उम्मीद है वे दूसरे तथा तीसरे नाम बताते-बताते दम तोड़ देंगे। वजह यह है कि उन्हें उन ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहरों में कोई दिलचस्पी नहीं है (अपवाद छोड़कर) – यदि इन आंकड़ों का विश्लेषण करें तो देश के सम्पूर्ण क्षेत्रफल में औसतन प्रत्येक 892 किलोमीटर पर एक न एक ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर है। इनमें सबसे अधिक 743 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर उत्तर प्रदेश में हैं, यानि उत्तर प्रदेश के 324 प्रति किलोमीटर क्षेत्रफल पर एक न एक ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर है।उत्तर प्रदेश के बाद दूसरा स्थान कर्नाटक का है जहाँ 506 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर हैं। तीसरा स्थान तमिल नाडू का है जहाँ 413 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर हैं। पांचवा स्थान गुजरात (293 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर); छठा स्थान मध्य प्रदेश (292 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर); सातवां स्थान महाराष्ट्र (285 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर), आठवां स्थान राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली जहाँ 174 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर हैं। भौगोलिक क्षेत्रफल के दृष्टि से राजस्थान बहुत बड़ा भूभाग है, लेकिन यहाँ 162 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर हैं। पश्चिम बंगाल में 136 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; आंध्र प्रदेश में 129 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; हरियाणा में 91 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; ओडिशा में 79 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; बिहार में 70 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; जम्मू-कश्मीर में 56 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; असम में 55 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; छत्तीसगढ़ में 47 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; उत्तराखंड में 42 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; हिमाचल प्रदेश में 40 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; पंजाब में 33 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; केरल में 27 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; गोवा में 21 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; झारखण्ड में 13 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर हैं और अंत में दमन-दीव में 12 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर स्थित हैं।
बहरहाल, जब दरभंगा और राजनगर की बात चली तो बता दूँ कि दरभंगा के राजाबहादुर विशेश्वर सिंह के सबसे बड़े पौत्र और दरभंगा राज की तीसरी पीढ़ी के सबसे बड़े पुत्र और राजनगर का “वास्तविक वारिस” किसी भी स्थान पर दरभंगा राज की संपत्ति की वर्तमान दशा और दिशा को देखकर अन्तःमन से दुःखी हैं, विह्वलित है, आत्मा कलप रहा है। वे अपने पुरखों की छवि को पुनः स्थापित तो करना चाहते हैं, परन्तु जीवन के उस पड़ाव पर बात-बात पर कचहरी-मुकदमा जाने की हिम्मत नहीं रखते, असहाय हैं।
वे जानते हैं कि दरभंगा राज की नींव क्रमशः कमजोर हो रही है। उनके पुरखों का उदाहरण देकर जिस दरभंगा राज की गरिमा की, यहाँ के राजा-महाराजाओं की वर्चस्व की चर्चाएं की जाती थी, आज समय के गर्त में धूमिल हो गई है। आज दरभंगा राज की गरिमा समाप्त हो गयी है। लेकिन वे स्वयं में इतना सामर्थ नहीं जुटा पा रहे हैं कि वे दरभंगा राज की गरिमा को पुनः स्थापित कर सकें। उनका मानना है कि इस ऐतिहासिक राज की गरिमा को पुनः स्थापित करने के लिए सबसे अधिक आवश्यक है राज परिवार के लोगों के बीच, विशेषकर पुरुषों के बीच, सामंजस्य का होना, जिसकी किल्लत है। प्रत्येक बात का निदान कचहरी में नहीं हो सकता। राज दरभंगा के लोगों का मानना है कि आज भी वैसे समस्याएं कुछ भी नहीं है, परन्तु जब सभी बातों की पहली और अंतिम छोड़ संपत्ति और अधिपत्य से निकलती है, स्वाभाविक है समस्याएं उत्पन्न होंगी ही। फिर भी, ऐसी कोई भी समस्या नहीं है जिसका निदान आपसी भाईचारे, बातचीत, सामंजस्य, सोच-विचार से नहीं हो सकता है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि इन्ही चीजों की किल्लत है दरभंगा के लाल-किला के अंदर।

रत्नेश्वर सिंह राजा बहादुर महाराज कुमार विशेश्वर सिंह के सबसे बड़े पौत्र हैं। विशेश्वर सिंह दरभंगा के अंतिम राजा महाराजाधिराज सर कामेश्वर सिंह के अनुज थे। परिवार के बृक्ष के अनुसार, विशेश्वर सिंह के तीन पुत्र थे – राजकुमार जीवेश्वर सिंह, यज्ञेश्वर सिंह और शुभेश्वर सिंह। जीवेश्वर सिंह की दो शादियां तो थी, परन्तु कोई पुत्र नहीं था। दोनों पत्नियों में उनकी सात बेटियां – कात्यायनी देवी, दिव्यायानी देवी, नेत्रायणी देवी, चेतना दाई, द्रौपदी दाई, अनीता दाई और सुनीता दाई थी। जबकि उनसे छोटे भाई राजकुमार यज्ञेश्वर सिंह के तीन पुत्र हुए। उन तीन पुत्रों में रश्मेश्वर सिंह की मृत्यु हो गई। शेष दो पुत्र आज जीवित हैं – रत्नेश्वर सिंह और राजनेश्वर सिंह। राजनेश्वर सिंह को “न्यूरो” से सम्बंधित बीमारियां हैं और वे शरीर से बहुत दुरुस्त नहीं हैं। इधर, रत्नेश्वर सिंह को कोई संतान नहीं है। जबकि छोटे भाई को एक पुत्र है – ऋत्विक सिंह । विशेश्वर सिंह के सबसे छोटे पुत्र शुभेश्वर सिंह (अब दिवंगत) के दो पुत्र है – राजेश्वर सिंह और कपिलेश्वर सिंह । इसी तरह राजेश्वर सिंह को दो पुत्र और कपिलेश्वर सिंह को एक पुत्र हैं।
दरभंगा राज के लाल किला परिसर के लोगों के साथ-साथ वहां की मिट्टी, भवनों की दीवारें यह मानती है कि सैद्धांतिक रूप से कामेश्वर सिंह-विशेश्वर सिंह की तीसरी पीढ़ी के वंशज में सबसे बड़े पौत्र रत्नेश्वर सिंह और सबसे छोटे कपिलेश्वर सिंह हुए। इससे अगली पीढ़ी में ऋत्विक सिंह (रत्नेश्वर सिंह का भतीजा) और कपिलेश्वर सिंह का बेटा (सभी नाबालिग) वंशज है। चुकी महाराजाधिराज अपने छोटे भाई राजा बहादुर विशेश्वर सिंह को पिता द्वारा निर्मित तत्कालीन दरभंगा जिले का राजनगर (अब मधुबनी जिला में) ‘प्रसाद’ स्वरुप दिए थे, अतः इस विशाल भूखंड और महल का उत्तराधिकारी यज्ञेश्वर सिंह और उनका पुत्र रत्नेश्वर सिंह (चुकी जीवेश्वर सिंह को कोई पुत्र नहीं था) को मिलनी चाहिए था।
लेकिन जिस तरह महाराजाधिराज अपने बाद दरभंगा राज के लिए किसी को उत्तराधिकारी नहीं बना सके, उसी तरह राजा बहादुर राजनगर के लिए अपना कोई उत्तराधिकारी नहीं बनाये। स्वाभाविक है दस्तावेज पर हस्ताक्षर नहीं होने के कारण, चाहे हस्ताक्षर हिंदी में हियता, उर्दू में होता, बांग्ला में होता, मैथिली में होता या फिर अंग्रेजी में होता, तो बात कुछ और थी। लेकिन जब हस्ताक्षर है ही नहीं, तो राजनगर की संपत्ति भी दरभंगा रेसिडुअरी की ही संपत्ति मानी जाएगी। और यदि दरभंगा राज की वर्तमान व्यवस्था और क्रियाकलापों पर नजर दौड़ाया जाय तो आज महाराजाधिराज की सबसे छोटी पत्नी महारानी अधिरानी काम सुंदरी की आयु कोई 92-वर्ष और अधिक है। आज राज दरभंगा में जितने भी ट्रस्ट्स हैं, मसलन बड़ी राजमाता (महारानी रामेश्वरलाता), बाबू रबितेश्वर सिंह और अन्य, हेमचन्द्र रॉय और अन्य, जगदीश्वरी बौआसिन और अन्य, श्रीमती लक्ष्मी दाईजी, बबुआनास और दीआनस, दरभंगा राज रेसिडुअरी, कामेश्वर सिंह चेरिटेबल ट्रस्ट, कामेश्वर रिलिजियस ट्रस्ट, लक्ष्मीपुर ट्रस्ट, श्रीमान के झा ट्रस्ट इत्यादि में लगभग सभी ट्रस्टों पर छोटी महारानी की भागीदारी कागज पर तो हैं, परन्तु शरीर अब साथ नहीं दे रहा है। इतना ही नहीं, नियमानुसार ट्रस्टों में संख्या की पूर्ति हेतु ट्रस्टों में जो भी सदस्य हैं, उनका स्थान “नगण्य” है, या फिर स्थान मुद्दत से रिक्त पड़ा है। वैसी स्थिति में ट्रस्ट्स पर कुमार शुभेश्वर सिंह के पुत्रों का सर्वाधिकार हैं। शुभेश्वर सिंह के दोनों पुत्रों में राजेश्वर सिंह भारत की सीमा से बाहर अमेरिका में रहते हैं और उनके अनुज कपिलेश्वर सिंह दिल्ली में रहते हैं। जानकारों का कहना है कि दरभंगा राज की पीढ़ियों में आज जितने भी लोग हैं उनमें कपिलेश्वर सिंह सबसे अधिक “सवल” हैं और आधुनिक वातावरण में पले-पोसे होने के कारण आधुनिकता के सभी गुणों से संपन्न हैं।

आर्यावर्तइण्डियननेशन(डॉट)कॉम से बात करते रत्नेश्वर सिंह कहते हैं: “हमारी क्षमता सीमित है। जीवन के इस पड़ाव पर हम अपने माता-पिता परिवार को छोड़कर प्रत्येक बातों, समस्याओं के निदान हेतु कचहरी नहीं जाना चाहते। वैसे भी हमारी आर्थिक स्थिति भी उतनी सुदृढ़ नहीं है कि बात-बात पर मुकदमा लड़ें। चाहिए तो यही था कि राजनगर परिसर में स्थित राजबहादुर को प्रदत्त सम्पत्तियों पर पहला अधिकार राजा बहादुर के सबसे बड़े पुत्र कुमार जीवेश्वर सिंह के पुत्र का होता। चुकी बाबूजी के बड़े भाई जीवेश्वर सिंह को पुत्र नहीं था, अतः उनके छोटे भाई को मिलता। हम अपनी पीढ़ी के भाई-बहनों में सबसे बड़े है। एक बात और महत्वपूर्ण है और वह यह कि चुकी राजा बहादुर ने भी उक्त राजनगर संपत्ति के लिए कोई उत्तराधिकारी या डीड नहीं बनाये, स्वाभाविक है इतनी बड़ी संपत्ति पर अधिपत्य के लिए मनमुटाव होना। लेकिन इसका भी निदान है। महारानी के साथ सभी भाई एक साथ बैठकर इस समस्या का निदान कर सकते हैं। लेकिन हमारे बोलने, कहने से क्या होगा? आज हालत ऐसी है कि कौन कहाँ है, कैसा है कोइन नहीं जानता ? हमारे चाचाजी (कुमार शुभेश्वर सिंह) के बड़े बेटे अमेरिका में रहते हैं। छोटा दिल्ली में रहते है। जब भी कभी दरभंगा आते हैं चतुर्दिक लोगों से घिरे होते हैं। वे सभी लोग वैसे हैं जिनका दरभंगा राज परिवार से कुछ लेना देना नहीं है।”
महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह दरभंगा के महाराजा महेश्वर सिंह के सबसे बड़े पुत्र थे। महाराजा महेश्वर सिंह दरभंगा राज के 16 वें महाराजा थे, जिनके समय काल आते-आते दरभंगा राज तत्कालीन भारत के मानचित्र पर अपनी अमिट स्थान बना लिया था। कहा जाता है कि जब महाराजा महेश्वर सिंह की मृत्यु हुई उस समय लक्ष्मेश्वर सिंह महज दो वर्ष के थे। महाराजा महेश्वर सिंह सं 1850 से 1860 तक दरभंगा के महाराजा रहे। महाराजा महेश्वर सिंह की मृत्यु के पश्चात् कुमार लक्ष्मीश्वर सिंह के अवयस्क होने के कारण दरभंगा राज को कोर्ट ऑफ वार्ड्स के तहत ले लिया गया। जब कुमार लक्ष्मीश्वर सिंह बालिग हुए तब अपने पैतृक सिंहासन पर आसीन हुए। महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह सं 1880 से 1898 तक कुल 18 वर्ष राजगद्दी पर आसीन रहे। आधुनिक भारत का ऐतिहासिक दस्तावेज इस बात का गवाह है कि दरभंगा के महाराजा के रूप में ये काफी उदार, लोक-हितैषी, विद्या एवं कलाओं के प्रेमी एवं प्रश्रय देते थे। अपने शासनकाल में इन्होंने स्वयं को सम्पूर्णता के साथ सार्वजनिक कार्यों के लिए समर्पित कर दिए । लेकिन समय से कौन युद्ध कर सकता है। विधि का विधान देखिये महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह जिन्होंने अपने प्रान्त के ही नहीं, बल्कि मनुष्य की बोलने की, अभिव्यक्ति की व्यक्तिगत और राजनीतिक अधिकारों की स्वतंत्रता का समर्थन किया था, लोगों का आवाज खुद बने थे; उनके पोते-परपोते – कुमार शुभेश्वर सिंह – कपिलेश्वर सिंह – कालखंड आते-आते महाराजाधिराज सर कामेश्वर सिंह द्वारा स्थापित बिहार का दो महत्वपूर्ण अखबार – आर्यावर्त और दि इण्डियन नेशन – को न केवल ‘बंद’ कर दिया गया, बल्कि ‘नामोनिशान मिटा कर जमीन को भी बेच दिया गया। शायद इसे ही समय कहते हैं।
महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह को दरभंगा राज की राजगद्दी पर बैठने के बाद रामेश्वर सिंह को दरभंगा राज का बछोर परगना दी गयी और रामेश्वर सिंह ने अपना मुख्यालय राजनगर को बनाया l उनकी अभिरुचि भारतीय संस्कृति और धर्म में था। महाराजा रामेश्वर सिंह ने भारत के अनेक नगरों में अपने भवन बनवाये तथा अनेक मन्दिरों का निर्माण करवाया। अपनी अभिरुचि के अनुरूप उन्होंने राजनगर में राजप्रासाद का निर्माण कराया जिसकी कोना- कोना हिन्दू वैभव को दर्शाता था l तालाबों से युक्त शानदार महलों और भव्य मंदिरों, अलग से सचिवालय, नदी और तालाबों में सुन्दर घाट जैसे किसी हिन्दू साम्राज्य की राजधानी हो। महल में प्रवेश दुर्गा हॉल से होकर था जहाँ दुर्गा जी की सुन्दर मूर्ति थी। शानदार दरवार हॉल जिसकी नक्काशी देखते बनती थी। उससे सटे ड्राइंग रूम जिसमे मृग आसन उत्तर में गणेश भवन जो उनका स्टडी कझ था। महल का पुराना हिस्सा बड़ा कोठा कहलाता था। महल के बाहर सुन्दर उपवन सामने नदी और तालाब मंदिर के तरफ शिव मंदिर जो दझिन भारतीय शैली का बना था। उसी तरह सूर्य मंदिर ,सफ़ेद संगमरमर का काली मंदिर जिसमे प्रतिस्थापित माँ काली की विशाल मूर्ती दरभंगा के श्यामा काली के करीब करीब हुबहू था। सामने विशाल घंटा, वह भी दरभंगा के तरह हीं जिसके जैसा पूरे प्रांत में नहीं था। अर्धनारीश्वर मंदिर, राजराजेश्वरी मंदिर, गिरजा मंदिर जिसे देख के लगता था जैसे दक्षिण भारत के किसी हिन्दू राजा की राजधानी हो। राजनगर का सबसे भव्य भवन (नौलखा) 1926 ई. में बनकर तैयार हुआ था, जिसके आर्किटेक्ट डाक्टर एम ए कोर्नी था। महाराजा रामेश्वर सिंह अपनी राजधानी दरभंगा से राजनगर लाना चाहते थे लेकिन कुछ कारणों से ऐसा न हो सका।

महाराजा रामेश्वर सिंह का 1929 में देहांत हुआ और उनके चिता पर दरभंगा के माधेश्वर में माँ श्यामा काली की भव्य मंदिर है। उनके मृत्यु के बाद राजनगर श्रीविहीन हो गया। दुर्भाग्य देखें कि 1934 और बाद के भूकम्पों में ताश के महल जैसा धराशायी हो गयी। आज एक-एक दीवार अलग-अलग दिखती हैं। तत्कालीन वैभव मिट्टी पर बिलखता दिखता है। अपनी युवावस्था में जिन लोगों ने इस भवन का, इस परिसर का यौवन रूप देखा है, आज दरभंगा राज परिवार के लोगों की सामूहिक उपेक्षा के कारण सम्पूर्ण परिसर खुद पर बिलख रहा है। अभी भी कई मंदिर और राजप्रसाद के खंडहर से पुरानी हिन्दू वैभव की याद आती है। इसकी एक एक ईंट भारत के महान साधक की याद दिलाती है l राज नगर पैलेस का निर्माण सन 1884-1929 के बीच हुई थी। इसका परिसर कुल 1500 एकड़ भूमि क्षेत्र में फैला है। जिसमें 11 मंदिर अवस्थित हैं। कहा जाता है कि इस ऐतिहासिक भवन के निर्माण में 22 लेयर का कार्विंग किया गया है, जो की ऐतिहासिक ताज महल से भी अधिक है। ताज महल में कार्विंग का लेयर 15 है। इस भवन के सामने चार हाथियों के पीठ पर स्थित सम्पूर्ण भवन भारत का एकलौता भवन है। इतना ही नहीं इस भवन के भगवती – स्थान के पास मिथिला लोक चित्रकला भी दिखता है। रत्नेश्वर सिंह आगे कहते हैं: “हमारी कोशिश हमेशा रहती है कि परिवार के सभी लोगों से, भाई बहनों से, उनके बच्चों से संपर्क बनाए रखें। मैं महारानी जी से भी समस्त परिवार के साथ महीने में एक दो बार जरूर मिलता हूँ। वे भी जब स्वस्थ रहती हैं मेरे घर आती हैं। लेकिन उम्र के साथ वे भी कमजोर हो रही है। महाराजा द्वारा निर्मित सभी ट्रस्टों में उनकी भी भागीदारी हैं। उन्हें भी चतुर्दिक लोग धीरे रहते हैं ताकि उन्हें भी कुछ फायदा हो जाए। सुनने में आया है कि कामेश्वर सिंह रिलिजियस ट्रस्ट में वे कपिलेश्वर सिंह का नाम नॉमिनेट कर दिए हैं। कपिलेश्वर जब दरभंगा आते हैं हमारी कोशिश रहती है कि एक बार मिल लूँ, बड़ा हूँ उम्र में। शेष समय बताएगा।”
महाराजाधिराज की मृत्यु-तारीख (1 अक्टूबर, 1962) से पहले शोध-पन्नों की संख्या से उक्त तारीख के बाद शोध-पन्नों की संख्या कई गुना अधिक होगा। वजह भी है – संपत्ति और शोहरत अर्जित करने में राजा महेश ठाकुर (मृत्यु 1558) से लेकर महाराजाधिराज सर कामेश्वर सिंह (मृत्यु 1 अक्टूबर, 1962) तक, दरभंगा के कुल 20 राजाओं, महाराजाओं को विगत 410 वर्षों में जो मसक्कत करना दुर्गा पूजा पर भव्य आयोजन राजनगर में होता था। मंदिरों में नित्य पूजा – पाठ, भोग, प्रसाद ,आरती नियुक्त पुरोहित करते थे l राजनगर का सबसे भव्य भवन (नौलखा) 1926 ई. में बनकर तैयार हुआ था, जिसके आर्किटेक्ट डाक्टर एम ए कोर्नी था। महाराजा रामेश्वर सिंह अपनी राजधानी दरभंगा से राजनगर लाना चाहते थे लेकिन कुछ कारणों से ऐसा न हो सका।

बहरहाल, सूत्रों के अनुसार दरभंगा की वर्तमान व्यवस्था को देखने से यही लगता है कि महारानी अधिरानी कामसुन्दरी की मृत्यु के बाद दरभंगा राज में, महाराजाधिराज-राजाबहादुर के परिवार और अगली पीढ़ियों में कपिलेश्वर सिंह की निगाह सभी सम्पत्तियों पर है, विशेषकर रामबाग और राजनगर पर। वैसे राजनगर के एक हिस्से में सैन्य टुकड़ी का कैम्प है और दूसरे तरफ मिथिला विश्वविद्यालय का एक कालेज। कहा जाता है कि परिसर में सम्पत्तियों के उपयोग के एवज में किराया मिलता है। अब सवाल यह है कि क्या राजनगर को सैन्य कैम्प और महाविद्यालय को खाली कराने की क्षमता वे रखते हैं ? शायद नहीं। वैसी स्थिति में आने वाले समय में इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि राजनगर का सम्पूर्ण इलाका बिक जाए, क्योंकि क्रेता तो यत्र-तत्र-सर्वत्र फैले हैं। इसलिए समय दूर नहीं दीखता है जब दरभंगा राज के आधुनिक इतिहास से राजनगर के स्थान पर किसी और का नाम लिखा जाए।
क्रमशः