* क्या महाराजाधिराज दरभंगा सर कामेश्वर सिंह का ‘संपत्ति-विल’ को बदला गया था?
* क्या तत्कालीन पदाधिकारीगण जो महाराजाधिराज की मृत्यु के बाद सम्पत्तियों के इर्द-गिर्द चहलकदमी कर रहे थे, ‘स्वहित’ में सम्पत्तियों के साथ खिलवाड़ किये ?
* क्या महाराजाधिराज की सम्पत्तियों को अपने-अपने लाभार्थ औने-पौने में तत्कालीन अधिकारियों, लाभार्थियों द्वारा नेश्तोनाबूद कर दिया गया ?
* क्या महाराजाधिराज की सम्पत्तियों का इस्तेमाल बिहार की जनता, मिथिलांचल की जनता के लिए नहीं किया जा सकता था, जहाँ के वे महाराजाधिराज थे?
* क्या महाराजाधिराज की वसीयत के अनुसार ही जीवित महारानी अपने ट्रस्ट के अधीन की सम्पत्तियों को अपने मरणोपरांत महाराजाधिराज के कर-क़दमों का पालन करती महाराजाधिराज के वंशजों की ब्राह्मण पत्नी से उत्पन्न संतान (जैसा की महाराजाधिराज केवसीयत में उल्लिखित था) को ही हकदार बनाएंगी ?
* जब दरभंगा राज को ‘अगला महाराज नहीं मिला’, फिर महाराजाधिराज की गद्दी से लगी संपत्ति का क्या हुआ जिसका मोल भारत सरकार के सूचकांक के अनुसार कुल 6500 करोड़ आँका गया था ? बहुत सारे सवाल हैं जो “अनुत्तर” रहे आज तक। लेकिन अनेकानेक अनछुई बातें शीघ्र ही प्रकाश में आने वाली हैं – सचित्र, पोख्ता दस्तावेजों के साथ प्रकाशित होने वाले किताब के माध्यम से।
बहरहाल, आखिर कौन सा ऐसा “गुप्त-रहस्य” रहा होगा जिसके कारण दरभंगा के महाराजाधिराज सर कामेश्वर सिंह की सम्पूर्ण सम्पत्तियों से सम्बन्धित “विल” को क्रियान्वित करने के लिए तत्कालीन न्यायमूर्ति लक्ष्मीकान्त झा “सोल-एग्जिक्यूटर” के रूप में पटना उच्च न्यायालय को छोड़कर कलकत्ता उच्च न्यायालय का रास्ता अपनाये ?
कहा जाता है कि महाराजाधिराज सर कामेश्वर सिंह की सम्पूर्ण सम्पत्तियों की सूची बनाते समय सम्बद्ध अधिकारीगण “थक” गए थे और सम्पत्तियों की सूची कुल 270 पृष्ठों तक गयी। आश्चर्यवश, महाराजाधिराज का “विल” कुल “सत्रहपृष्ठों में सिमट गया।

कलकत्ता उच्च न्यायालय के तत्कालीन रजिस्ट्रारके. एल. दत्त ने ”प्रोबेट टू द सोल एग्जिक्यूटर” दिनांक 25-09-1963को लिखा भी है: “…the last will of Maharajadhiraja Sir Kameshwara Singh Bahadur of Darbhanga late a Hindu inhabitant of Darbhaga in the state of Bihar ‘outside the aforesaidjurisdiction’ (In the High Court at Calcutta)….”
महाराजा सर कामेश्वर सिंह, सांसद (राज्यसभा) दुर्गापूजा के अवसर पर अपने निवास दरभंगा हाउस, मिड्लटन स्ट्रीट, कोल्कता से अपने रेलवे सैलूनसे नरगोना (दरभंगा) स्थित अपने रेलवे टर्मिनल पर कुछ दिन पूर्व उतरे थे।पहली अक्टूबर, 1962 को नरगोना पैलेस के अपने सूट के बाथरूम के नहाने के टब मेंमृत पाये गए । कहा जाता है कि उस सुवह वे मालिस वगैरहकराकर इन्सुलिन सूई लगवाकर स्नानागार गए थे। वे डायबिटीज के मरीजथे। स्नानागार से मृत लाये गए। उनके गेशुएँ जश-के-तस थे।
सम्पूर्ण दस्तावेजों के साथ शीघ्र प्रकाशित होने वाली एक बेहतरीन कॉफी-टेबुल किताब का मानना है कि “आख़िर वह कौन सा वजह रहा होगा, कौन सा गुप्त-रहस्य रहा होगा, किन-किन तत्कालीन महानुभावों की मिलीभगत रही होगी जिसके कारण पटना उच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार को नजर अंदाज कर ‘विल’के एग्जिक्यूशन को प्रोबेट करने के लिए कलकत्ता उच्च न्यायालय का दरबाजा खटखटाया गया। पुस्तक में इस बात को बहुत विस्तार से वर्णन किया जा रहा है कि आखिर 270 पृष्ठों की संपत्ति-सूची का विल महज 17 पृष्ठों में कैसे सिमटा दिया गया। पुस्तक में सभी 270-पृष्ठों की सूची को बहुत ही प्राथमिकता के साथ उद्धृत किया गया है।
ज्ञातब्य है कि बिहार में तत्कालीन गवर्नर जेनेरल ऑफ़इण्डिया सर चार्ल्स हार्डिंज के हाथों 1 दिसम्बर, 1913 को पटना उच्च न्यायालय का नींव रखा गया। इससे पहले 22 मार्च, 1912 को इस विषय के लिए प्रोक्लेमेशन किया गया था। पटना उच्च न्यायालय भवन सभी व्यावहारिक दृष्टिकोणसे तत्कालीन गवर्नर जेनेरल ऑफ़ इण्डियासर चार्ल्स हार्डिंज हीलोकार्पित किया गया और यह न्यायालय पहली मार्च 1916 से अपना कार्य करना प्रारम्भकर दिया। न्यायमूर्ति सर एडवर्ड मेनार्ड देस चैंप्स चमेर पटना उच्च न्यायालय के प्रथम मुख्य न्यायाधीश थे।
जबकि, कलकत्ता उच्च न्यायालय की स्थापना हाईकोर्ट ऑफ़ जुडिकेचर एट फोर्ट विलियम के रूप में 1 जुलाई, 1862 को हुई। इसकी स्थापना की मुहर क्वीन विक्टोरिया ने लगाई थी और यह भारत के तीन पुराने न्यायालयों में से एक है। स्वाभाविक हैं कलकत्ता उच्च न्यायालय उन दिनों “बेहतरीन न्यायालयों” में से एक रहा होगा।
सूत्रों के अनुसार महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह और दरभंगा राज पर किताब लिखने का कार्य मिथिलाञ्चल के तीन मूर्धन्य हस्ताक्षरों -श्री अमरनाथ झा, श्री रमानाथ झा और श्री गंगानाथ झा- को करना था। लेकिन तीनों की मृत्यु हो गयी। सूत्रों के अनुसार अब इस लिखने की प्रक्रिया में पांच अन्य विभूतियों के अलावे दो विदेशी लेखक भी हैं जो सभी दस्तावेजों के आधार पर लिखने का कार्य प्रारम्भ किये हैं। कहा जाता है कि इस पुस्तक में “साख्य” और”दस्तावेजों” की प्रतियों को बहुत ही तबज्जो के साथ स्थान दिया जारहा है।
कुछ अन्य दस्तावेजों के आधार पर महाराजाधिराज सर कामेश्वर सिंह के “विल” को भी प्रश्नवाचक चिन्ह के अधीन लाया गया है। पचास के दसक के अंतिम वर्षों में एक चिठ्ठी के अनुसार महाराजाधिराज को यह सूचित किया गया था कि उनके द्वारा लिखे गए “विल” को सुरक्षित रहा गया है।

महाराजाधिराज सर कामेश्वर सिंह सन 1933 से 1946 तक कौन्सिल ऑफ़ स्टेट के सदस्य थे। वे सन 1947 से 1952 तक संविधान सभा के भी सदस्य थे। सन 1930 -31 में संपन्न हुए प्रथम और दूसरे राऊण्ड टेबुल कांफ्रेंस के सदस्य भी थे। उन्हें नाइट कमाण्डर ऑफ़ द मोस्ट एमिनेंट ऑर्डर ऑफ़ द इण्डियन एम्पायर के ख़िताब से भी नबाजा गया था। ऐसी स्थिति में महाराजाधिराज क़ानूनी-रूप से इतने ”सुदृढ़” तो अवश्य रहे होंगे और यह जानते भी होंगे की नए विल के निर्माण के साथ पुराना विल स्वतः निरस्त हो जायेगा। वैसी स्थिति में जब पचास के दसक के उत्तरार्थ में एक विल बनकर भारत के एक महत्वपूर्ण और उत्तरदायी बैंक में सुरक्षित रखा था; तो फिर “दूसरा विल” कैसे बना? किताब में दोनों विलों को बहुत ही महत्वपूर्ण तरीके से स्थान दिया गया है।
महाराजाधिराज सर कामेश्वर सिंह पर बन रही इस ऐतिहासिकस चित्र और दस्तावेजों के साथ पोख्ता किताब में कई घटनाओं को, जो विल के बनने से लेकर एग्जिक्यूशन के साथ प्रारम्भ होती है, को प्रश्नवाचक चिन्ह के अधीन भी लाया गया है। प्रश्नवाचक चिन्हों में तक़रीबन 20 से अधिक “अनुत्तर सवाल” हैं जो दरभंगा राज से जुड़े कई महत्वपूर्ण लोगों की ओर इशारा किया है। इसके अतिरिक्त, महाराजाधिराज के सगे-सम्बन्धियों को भी, जो उनकी सम्पत्तियों के हिस्सेदार बने, प्रश्नवाचक चिन्हों के दायरे में लिया है।
ज्ञातब्य हो कि महाराजाधिराज की मृत्यु के बाद आनन्-फानन में माधवेश्वर में इनका दाह संस्कार दोनों महारानीकी उपस्थिति में कर दिया गया। बड़ी महारानी को देहांत की सूचना मिलने पर अंतिम दर्शनके लिए सीधे शमशान पहुंचना पड़ा था। महाराजा कामेश्वर सिंह को संतान नहीं था। इनके उतराधिकारको लेकर शमशान में उपस्थित लोगों के मन में अनेकानेक प्रश्न उठे थे -लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न इस किताब में उठने जा रहा है कि “जब उत्तराधिकारी कोई बना ही नहीं, फिर दरभंगा महाराजाधिराज की गद्दी से साथ जो सम्पत्तियाँ जुड़ी थी,उसका क्या हुआ ?

दस्तावेजों के अनुसार भारत सरकार के अस्सी के दसक के मूल्य-सूचकांक के आधार पर गद्दी से जुड़ी सम्पत्तियों का मोल कोई 6500 करोड़ आँका गया था। बहरहाल, कहा जाता है कि राजकुमार शुभेश्वर सिंह और राजकुमार यजनेश्वर सिंह वसीयत लिखे जाने के समय नाबालिक थे और उनकी शादी नहीं हुई थी सबसे बड़े राजकुमार जीवेश्वर सिंह की दूसरी शादी नहीं हुई थी। शायद महाराजा को अपनीमृत्यु की अंदेशा था ।
किताब में इस बात को भी प्रश्नित किया गया है कि वैसे वसियत के अनुसार दोनों महारानियों के जिन्दा रहने तक संपत्ति का देखभाल ट्रस्टके अधीन रहेगा और दोनों महारानी के स्वर्गवाशी होने के बाद संपत्ति को तीन हिस्सा में बाँटने जिसमे एक हिस्सा दरभंगा के जनता के कल्याणार्थ देने और शेष हिस्सा महाराज के छोटे भाई राजबहादुर विशेश्वर सिंह जो स्वर्गवाशी हो चुके थे के पुत्र राजकुमार जीवेश्वर सिंह ,राजकुमार यजनेश्वर सिंह और राजकुमार शुभेश्वर सिंह के “अपने ब्राह्मण पत्नी से उत्पन्न संतानों के बीच वितरित” किया जाने का प्रावधान था ।
यहाँ यह भी सवाल उठाया गया है कि मिथिला के लोगों को यह जानने का सम्पूर्ण अधिकार है कि “एक महारानी, जिनकी मृत्यु हो गयी, उनकी सम्पतियों का क्या हश्र हुआ? क्या वे वसीयत में लिखे निर्देशों का पालन किया? महाराजाधिराज की दूसरी पत्नी, जो आज जीवित हैं और उनकी संपत्ति एक ट्रस्ट के अधीन हैं, क्या वे सम्पत्तियाँ वसीयत के करारनामे के अनुसार स्वतः उन लोगों के हाथों पहुँच जाएगी ? क्या महारानी भी अपनी इक्षा में ऐसा कोई प्रावधान, उल्लेख करने वाली है (जैसा की महाराजाधिराज के वसीयत में उल्लिखित था – ब्राह्मण पत्नी से उत्पन्न संतान) – यह तो समयबताएगा। (क्रमशः)