कोरोना वायरस से भी अधिक महत्वपूर्ण बात दिल्ली के राजपथ पर यह है कि क्या प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी आज़ाद भारत के 73 वें वर्षगांठ पर दिल्ली के लाल किले पर तिरंगा ध्वजारोहण उसी तामझाम से कर पाएंगे या कोरोना वायरस के प्रकोप के कारण “सोसल डिस्टेन्सिंग” को मद्देनजर अकेले ध्वजारोहण करेंगे या फिर “मन-की-बात” की तरह लोगों को सन्देश देंगे या फिर “इन्टरनेट के जरिये कंप्यूटर से राष्ट्र को सम्बोधित करेंगे” ?
इसका मुख्य कारण यह है कि भारत में चीन से कोरोना वायरस के आयात के बाद लगे लॉक डाउन के बाद भी देश में कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों की संख्या या फिर मृतकों की संख्या में उत्तरोत्तर वृद्धि ही हो रही है। वैसे देश के नेता लोग दिल्ली सहित अपने-अपने राज्यों में इस बात को लेकर थाली-कटोरी-लोटा-ढ़ोल और अन्य बजने के सामग्रियां पीट रहे हैं कि भारत इटली को पीछे छोड़कर कोरोना वायरस वैश्विक महामारी से सबसे बुरी तरह से प्रभावित दुनिया का छठा देश है, न की पहला ।
वैसी स्थिति में यह सोचना की अगले 60-दिनों में देश में, खासकर दिल्ली में, स्थिति ऐसी हो जाएगी की लाखो-लाख लोग लालकिले परिसर में एकत्रित हो सकें – गलत होगा। वैसे कुछ लोग यह भी कहते हैं कि “मोदी है तो मुमकिन है। ” अगर ऐसा हुआ तो आज़ाद भारत के 73-वर्ष के इतिहास में यह पहला अवसर होगा जब लाल किले पर तिरंगा के सम्मान के आगे, राष्ट्र के लोगों का जीवन “सर्वोपरि” होगा।
वैसे सरकारी महकमे में कोई भी अधिकारी इस विषय पर किसी प्रकार की टिपण्णी नहीं करना चाहते हैं कि आगामी 15 अगस्त को प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्र मोदी लाल किले पर दिल्ली के लाखों-लाख दर्शकों की उपस्थिति में तिरंगा का ध्वजारोहण करेंगे अथवा नहीं?
लेकिन जिह्वा को इधर-उधर कर यह कहने में तनिक भी हिचकी नहीं ले रहे हैं कि “अगर कोरोना वायरस प्रकोप आगामी महीनो तक नियंत्रण में आ गया और भारत सहित विश्व के वैज्ञानिक, डाक्टर इस बात की गारंटी ले लिए की अधिक संख्या में लोगों की उपस्थिति से भी कोरोना वाइरस संक्रमण नहीं कर पायेगा – तभी लाल किले का कार्यक्रम सार्वजनिक होगा।
वैसे “राजनीति” में कुछ भी हो सकता है। जैसा की लोगबाग कहते भी हैं: “मोदी है तो मुमकिन है” ।

अब सबसे अहम् सवाल यह है की देश के स्वास्थ मंत्री डॉ हर्षवर्धन साहेब में इतना बड़ा कलेजा नहीं है कि वे प्रधान मंत्री को राय दे सकें की वर्तमान अथवा तत्कालीन समय में भी देश स्वास्थ के दृष्टिकोण से इतना सवल नहीं हुआ होगा की लाल किले जैसे क्षेत्र में लाखों लोग एकत्रित हो सकें, प्रधान मंत्री का भाषण सुन सकें, ‘लोगों के लाभार्थ’ किये गए ‘सरकारी कार्यों’, ‘योजनाओं’ सम्बन्धित ‘रिपोर्ट-कार्ड’ कानों से अवलोकन कर सकें।
वैसे डॉ हर्षवर्धन अब विश्व स्वास्थ संगठन के बैनर तले कुछ भी कर सकते हैं। वजह भी है : अगर माननीय प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी नहीं होते तो विश्व स्वास्थ संगठन के लेटर-हेड पर डॉ हर्षवर्धन का नाम भी नहीं होता !! यह डॉ हर्षवर्धन भी जानते हैं, विश्व स्वास्थ संगठन के आला-अधिकारी भी जानते हैं, दिल्ली के चिकित्सकगण भी जानते हैं और माननीय प्रधान मंत्री जी तो जानते ही हैं। यानि “मोदी है तो मुमकिन हैं।”
अब सवाल रहा गृह मंत्री माननीय अमित शाह और उनके मंत्रालय का, तो माननीय श्री अमित शाह साहेब कभी नहीं चाहेंगे की मोदीजी के नाम पर कोई टिका-टिपण्णी हो, क्योंकि राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि ये दो व्यक्ति शरीर से भले अलग-अलग हैं, परन्तु मन-और-आत्मा से “अलग-थलग” नहीं हैं, दोनों “एक हैं – एक रहेंगे ।”
दिल्ली सरकार, यानि दिल्ली के मुख्य मन्त्री, उप-मुख्य मन्त्री या अन्य आला-अधिकारियों की कूबत नहीं है कि वे गृह मंत्री अथवा उनके मंत्रालय की बातों की अवहेलना कर सकें। अब कुल मिलाकर स्थिति ऐसी है कि “अगर मोदी जी चाहेंगे तो लाल किले से 73 वां वर्षगाँठ मनाएंगे देश की आज़ादी का” यानि “मोदी है तो मुमकिन है।”