झरिया / धनबाद : धनबाद में पदस्थापित होने वाले ऊँची कुर्सी के अधिकारीगण, मसलन उपायुक्त, पुलिस अधीक्षक बिहार के किसी भी अन्य राज्यों में पदस्थापित उनके समकक्ष अथवा शीर्ष अधिकारियों की तुलना में, पटना सचिवालय स्थित मुख्यमंत्री कार्यालय की कुर्सी से सीधा और अधिक ‘सीसीटीवी’ की नजर में होते थे। प्रदेश के तत्कालीन वरिष्ठ अधिकारियों को अपने प्रदेश के, जिलों का हाल-चाल, स्वास्थ बताने में भले देर लगता हो; उन दिनों धनबाद में प्रस्थापित उपायुक्त हमेशा मुख्यमंत्री के गर्म-लाइन से जुड़े होते थे।
बारिस के मौसम में, ठंढ के मौसम में वह ‘गर्म-लाइन” अधिकारियों के बहुत काम आते थे। चाहे छींक आये या वायु-त्याग, तक्षण मुख्यमंत्री कार्यालय को, मुख्यमंत्री को व्यक्तिगत रूप से अवगत करना होता था। यही नियम था। कोई ‘प्रशासनिक’ कार्य के तहत नहीं होता था, बल्कि एक “सुनियोजित प्रशासन” के तहत धनबाद के खास-खास लोगों को उनके आकार-प्रकार की कटाई-छटाई करने लिए होता था क्योंकि आम आदमी तो सत्ता के बराबर हो ही नहीं सकता था, इसलिए उसे कोई चिंता नहीं होती थी – कोउ नृप होइ हमैं का हानी, चेरि छाड़ि अब होब की रानी।”
तत्कालीन मुख्यमंत्रीगण इस बात से भयभीत होते थे कि कहीं ‘अमुक व्यक्ति’, हमसे, हमारे संरक्षित व्यक्ति से, संस्था से, पार्टी से, नेता से, संगठन से आगे नहीं निकल जाय। कहीं आला-कमान की नजर उस पर “सकारात्मक” रूप से नहीं पड़ जाय । इस कारण पूरे धनबाद जिले में “बड़े साहब” के द्वारा “पोषित”, “सम्पोषित” “अधिकारी”, “धर्माधिकारीगण” हमेशा अपने-अपने आतंरिक वस्त्र को कसे रहते थे – कब बुलाबा आ जाय? कब दौड़कर भागना पड़े?
कई मर्तबा तो ऐसी भी घटना हुई है जब जिले के अधिकारी बिस्तर पर तीन-चार सांस लिए ही होते थे, बड़े साहेब का फोन ट्रिंग-ट्रिंग करने लगता था। ऐसी हालत में वे कहाँ, उनका वस्त्र कहाँ – रास्ते भर समेटते, बटन लगाते अपनी हाज़री उपायुक्त के घर पर हाज़िरी लगाने पड़ते थे ताकि साहब गुस्सा में नहीं आ जाएँ या फिर नौकरी पर कोई आफत नहीं आ जाय। हड़बड़ी में कई बार अधिकारी अपने पतलून का ज़िप ऊपर खींचना भी भूल जाते थे। अस्सी के दशक में जो महाशय धनबाद समाहरणालय में पदस्थित थे, वे सभी उपरोक्त पंक्तियों के शब्दों से कई हज़ार गुना प्रथम द्रष्टा होंगे, अधिक जानते होंगे – यह पक्का है। खैर।
अगर ऐसा नहीं होता तो सं 1956 से अब तक धनबाद समाहरणालय में कोई 49 – उपायुक्त का नाम पीतल के अक्षरों में गोदना के तरह नहीं गोदाया होता। सं 1956-2021 यानी 65 साल, यानी औसतन एक समाहर्ता का धनबाद समाहरणालय में सेवा अवधि एक साल तीन महीना है। अब आप ही सोचिये, कि एक उपायुक्त अपने जिले में एक साल तीन महीने में क्या कर लेगा? जिन उपायुक्त को अधिक समय तक रखा गया, इसका अर्थ होता था कि वे ‘फलनमा मुख्यमंत्री’ के ‘नुमायंदे’ हैं, मुख्यमंत्री कार्यालय में उनके मालिक बैठे थे और मुख्यमंत्री महोदय दिल्ली के सिंहासन पर बैठे प्रधान मंत्री की इक्षा पर ।
इतना ही नहीं, सं 1985 में जब ए के उपाध्याय जी उपायुक्त थे, उस समय से लेकर कोयला क्षेत्र में आधिकारिक शब्दों से अलंकृत कोयला माफिआओं की समाप्ति तक और झारखण्ड राज्य के निर्माण तक 14 उपायुक्त की लम्बी सूची नहीं बनती। विशेषकर मई 1986 के बाद से जैसे जैसे पटना में मुख्यमंत्री कार्यालय में नए नए चेहरे दीखते थे, धनबाद में समाहर्ताओं का रंग-रूप,आकार-प्रकार और नाम भी बदल जाता था। मुख्य मंत्री बदलते ही ‘गजबे’ का परिवर्तन होता था धनबाद समाहरणालय के आला अधिकारियों के नाक-नक्शा में। लेकिन ‘चमचावाज’, ‘मक्खनवाज’ अधिकारीगण तो ‘टमाटर’ के रूप में स्वयं को ढाल लेते थे। जैसे टमाटर सभी सब्जियों में ‘मिलनसार’ होता है, ‘ऐसे अधिकारी जल्द ही चीनी जैसा घुल-मिल जाते थे। लक्ष्मी जी का गजब स्वभाव है।

उन दिनों धनबाद के समाहरणालय में जो भी आला अधिकारी जिला का कमान सँभालते थे, सर्वप्रथम स्थानीय अख़बारों से लेकर पटना, दिल्ली, कलकत्ता के संवाददाताओं की सूची अपनी जेब में रखते थे, साथ ही उनका दूरभाष नंबर, मोबाईल तो जन्म नहीं लिया था और धनबाद शहर भी स्मार्ट शहर में दर्ज नहीं हुआ था। किसी भी प्रकार का “प्रशासनिक” कार्रवाई होने पर तत्काल उन “महानुभावों” को फोन कर बताया जा सके ताकि पटना में बैठे मुख्यमंत्री सहित धनबाद के उपायुक्त का नाम अख़बारों के पन्नों पर सुबह सवेरे चमकता रहे। आज भी वह परंपरा जारी होगा ही। वैसे एक तरह से इसे भी “छपास-नेक्सस” कहा जा सकता है। आधिकारिक तौर पर घुटने से लेकर ठेंघुने तक के नेता ऐसे लेकर अधिकारी तक कोई इस बात से इंकार नहीं कर सकते हैं कि उन्हें अपना नाम या चेहरा अख़बारों के पन्नों में प्रकाशित अचकघा नहीं लगता होगा।
उस दिन अपरान्ह का कोई 3 बजा था। मैं धनबाद के तत्कालीन उपायुक्त मदन मोहन झा से मिलने जाना था। समय तय था। मैं दी टेलीग्राफ अखबार में हुमच कर लिखना शुरु कर दिया था। मेरे लिखने से धनबाद से प्रकाशित ‘आवाज’ और ‘न्यू रिपब्लिक’ के मालिक मुझसे काफी खफा हो गया थे। कुछ महीनों के लिए मैं न्यू रिपब्लिक में सेवा की शुरुआत किया था। पटना के रविरंजन बाबू (ईश्वर आपकी आत्मा को शांति दें) मुझे वहां भेजे थे। मैं कभी नहीं चाहता था की मुझे धनबाद में “न्यू रिपब्लिक” का टैग लगे और यही कारण था कि उत्तम सेन गुप्ता मुझे दी टेलीग्राफ अखबार के लिए रास्ता बना दिए थे। सेनगुप्ता साहेब मुद्दत तक दी टेलीग्राफ के विशेष संवाददाता थे बिहार के। एम जे अकबर, शेखर भाटिया, उमेश आनंद, राजीव बागची आदि पत्रकारों के सहयोग से मैं अपनी कहानी के माध्यम से कलकत्ता में प्रफुल्ल सरकार स्ट्रीट आनंद बाज़ार पत्रिका समूह के दफतर में स्थान बन रहा था, पहचान बन रही थी। धनबाद डेटलाइन से दी टेलिग्राफ में मेरी एक कहानी अखबार के प्रथम पृष्ठ पर नीचे आठ कलम में अवतरित हो चुका था।
इस कहानी को करने में तीन पन्ने का कागज महत्वपूर्ण था। किसी भी सरकारी अधिकारी का कोट, पैजामा या गमछी का होना कोई आवश्यक नहीं था। जो बोल रहा था, कागज बोल रहा था, जो लिखा था वही कहानी थी। यह समाचार कोयला खदानों में “बालू” भरने से संबंधित थी, जिसमें धनबाद के कई सफ़ेद वस्त्रधारी भी सम्मिल्लित थे, जो धनबाद के सामाजिक मंच पर चढ़कर, बैठकर क़्वींटल-क़्वींटल गेंदा-गुलाब का माला गर्दन में लटकाते आ रहे थे। कुछ सफ़ेदपोस कोयला व्यापारी थे, कुछ सफ़ेद पोश लोहा व्यापारी थे, कई सफेदपोश स्लरी के व्यापारी थे। इस कहानी का महत्वपूर्ण अंग यह था कि भारत कोकिंग कोल और कॉल इण्डिया के खदानों में कोयला निकालने के बाद उक्त माइंस को कागज पर तो बालू से इस कदर भर दिया गया था कि एक-सांस हवा भी अंदर प्रवेश नहीं कर सकता था; लेकिन हकीकत में वह माइंस बांस-बल्ला-लकड़ियों के सहारे कभी भी ध्वस्त होकर न केवल अपना, बल्कि सैकड़ों कामगारों के जीवन अस्तित्व समाप्त करने पर सज्ज था।
यह समाचार कई परिचित, कई अपरिचित महामानवों को मेरी ओर आकर्षित किया। इस कहानी को धनबाद के तत्कालीन उपायुक्त मदन मोहन झा भी पढ़े थे। लेकिन अब तक न तो मैं ‘एम.एम. झा’ से मिला था और ना ही वे मुझे देखे थे। उस कहानी को लिखने में मुझे किसी सरकारी “कोट” की ज़रूरत नहीं हुई थी। जिला प्रमुख होने के कारण मिलने की इच्छा थी । देखना चाहता था उस अधिकारी को जिसे स्थानीय अखबार, पटना का अखबार “इतना बेहतर” मानता था । हम तो “बेहतर होने का कारण ढूंढने” निकला था।
उस दिन शायद 1989 साल का मार्च का महीना था। प्रथम तल्ले उनके दरवाजे पर दस्तक देकर मैं उनके कार्यालय में प्रवेश लिया। धनबाद जिला मानभूम का हिस्सा था। मानभूम को काटकर बोकारो और धनबाद बनाया गया था। ‘बंगाली संस्कृति’ की उपस्थिति धनबाद के उपायुक्त के कार्यालय में दिख रहा था। उपायुक्त साहब कुछ कार्य में व्यस्त थे। सामने कुछ लाल-पीला-हरा ‘पताखा ‘ लगा फ़ाइल टेबुल पर रखा था। मुझे गर्दन उठाकर ‘हूँ’ ‘हाँ’ करते स्वागत किये और इशारे में बैठने को कहा। उनके कथन का स्वागत करते मैं बैठ गया। घड़ी की सेकेण्ड की सूई टिक-टिक करते आगे निकल रही थी। कोई 90 सेकेण्ड के बाद, कलम को ढक्कन में घुसाते कहते हैं: “जी, कहा जाय।” मेरे पास उन्हें कहने की कोई बात ही नहीं थी। फिर भी मैं उनसे कहा कि आपसे मुलाकात नहीं हुई थी, देखा नहीं था, अतः देखना, मिलना चाहता था। मैं शिवनाथ झा हूँ। उनकी शारीरिक भाषा मुझे अच्छी नहीं लगी। फिर प्रणाम करते मैं कमरे से बाहर की ओर उन्मुख हो गया। उस के बाद मैं उन्हें जीवित रहते कभी नहीं मिला, आवश्यक नहीं समझा। काफी समय वे दिल्ली में भी थे, मैं भी था इण्डियन एक्सप्रेस दिल्ली में – लेकिन मेरी पत्रकारिता में उनकी जरुरत कभी नहीं पड़ी – क्योंकि मैं चापलूस नहीं था।
धनबाद में ए के उपाध्याय के बाद 20 मई, 1986 को मदन मोहन झा पदार्पित हुए थे, जो मई 26 मई 1989 तक कुर्सी पर रहे। इस दौरान उन्हें पटना सचिवालय में मुख्य मंत्री की कुरी पर बैठे बिंदेश्वरी दुबे, भागवत झा आज़ाद का वरदहस्त मिला। दुबेजी धनबाद और कोयला क्षेत्र में ‘इंटक’ की स्थिति से चिंतित थे। वे खुद एक ‘श्रमिक नेता’ थे। आज़ाद जी दिल्ली से अवतरित हुए थे। दक्षिण बिहार के जिलों को छोड़कर बिहार में ‘प्रशासन का डंडा’ चलाने का अवसर बिहार के किसी भी जिले में नहीं था – आज तो है ही नहीं – यह तो बिहार के नेता से अधिकारी तक जानते हैं।
और यह भी जानते होंगे कि कैसे दुबे बाबा पटना के पत्रकारों, विशेषकर फोटोग्राफर पर, जो चमचावाज नहीं थे, ‘हथ्थे से कबर” गए थे; जब उनकी एक तस्वीर प्रांतीय से राष्ट्रीय दैनिक तक, पटना के बुद्धमार्ग से लेकर कस्तूरबा गाँधी मार्ग तक छपी थी – बिहार के द्वितीय नागरिक बिंदेश्वरी दुबे मुंह फाड़ के मुर्गा के दाहिने टांग को अपने जबड़े से पकड़कर खिंच रहे थे, टांग से रस टप-टप नीचे जमीन पर टपक रहा था और उधर धनबाद में बाबू सूर्यदेव सिंह के विरूद्ध ‘अनुशासनिक कार्रवाई’ चल रही थी – मदनमोहन झा के द्वारा । बाबू सूर्यदेव सिंह की ठेंघुने और कमर कमजोर होते देख धनबाद से पटना और दिल्ली तक सैकड़ों लोग खुश हो रहे थे, कई अन्तःमन से दुखी। कोई प्रशासनिक क्रिया कलाप को ‘कहर’ कह रहे थे, तो कोई प्रशासन पर ‘कोहरा’ आने का समय का ‘दूर’ दर्शन कर रहे थे। यह सभी कार्य तब किये गए थे जब सूर्यदेव सिंह कारावास में बंद थे।
झरिया स्थित बिहार भवन, बिहार टॉकीज, उस परिसर में स्थित अन्य दुकानों को खाली कराया जाने की सभी कार्रवाई पूरी हो गयी थी। बाबू सूर्यदेव सिंह कहते रहे वे सन 1976 में उक्त भवन को 35 लाख में क्रय किये थे, उधर मदनमोहन झा, धनबाद के आला अधिकारी और पटना में मुर्गा तोड़ते मुख्यमंत्री दुबे जी कहते नहीं थक रहे थे कि उस भवन और परिसर पर सूर्यदेव सिंह का “अवैध कब्ज़ा” है। कोई तरह साल लम्बा न्यायिक से लेकर प्रशासनिक युद्ध लड़ा गया था। सवाल सिर्फ ‘झरिया पर कब्ज़ा’ का था।
उसी दिन शाम में पटना-दिल्ली से प्रकाशित एक हिंदी-अंग्रेजी समाचार पत्र के धनबाद संवाददाता से आमने-सामने हुआ। अंग्रेजी वाले पत्रकार मुझे देखकर व्यंगात्मक शब्दों में पूछा: ‘बॉस से मिलने गए थे?’ मैंने पूछा ‘बॉस’ कौन है? मेरे शब्दों को सुनकर फिर वे कहते हैं: मदनमोहन झा से मिलने गए थे ? मैंने कहाँ: मिलने नहीं, देखने गया था कौन है ? आपको देखकर मालूम हो गया ‘कैसे” हैं वे।
धनबाद में कुछ वर्ष कार्य करने के बाद इस बात का एहसास हो गया कि आखिर पत्रकार लोग अधिकारियों से क्यों चिपके रहते हैं, नेताओं से क्यों चिपकते है। अधिकारी लोग पत्रकारों का समूह बनाकर क्यों रहता है ? यह बात सिर्फ धनबाद तक ही सीमित नहीं था, जिला से लेकर प्रदेश के सचिवालय के रास्ते दिल्ली के संसद और सचिवालय तक कॉकरोच की तरह फैला था। हरेक अधिकारियों का अपना-अपना पत्रकार समूह होता है जो उनके कार्यों का प्रचार-प्रसार करने का जिम्मा उठाते हैं। धनबाद तो महज एक दृष्टान्त था।
* महीने भर बाद सम्मानित म.मो.झा का धनबाद से तबादला हो गया और फिर नामावली पर एक नए नाम का गोदना गोदाया – रामसेवक शर्मा।
कवर फोटो: जोयदेव गुप्ता / घनबाद
आगे लिखूंगा कैसे धनबाद का पत्रकार-गिरोह मुझे दी टेलीग्राफ की कहानी पर ‘ट्रेटर’ की उपाधि से अलंकृत किया था – क्रमशः