अरे भैय्या !!! अगर मर-मुर गए तो घंटा भी नहीं लगेगा घर वाले दफना देंगे, इसलिए ‘कोरोना वायरस’ को समझो ताकि घरवालों “को” “रोना” नहीं पड़े 

ध्यान रहे: घर से बाहर निकले तो कोरोना वायरस दबोच लेगा। 

  • ध्यान रहे – एक: कनिका कपूर को न देखना है, न सुनना है और घर से बाहर निकलना ही नहीं है – नहीं तो कोरोना वायरस आपको दबोच लेगा। 
  • स्वयं को “अफवाह वाले ज्ञान से अलग-थलग रखें, आईसोलेट रखें। आज-कल अख़बारों में जो पढ़ते हैं, टीवी पर जो देखते हैं; उसमें कितना सच है, आने वाली पीढ़ियां इसपर शोध करेगी। 
  • भारत के लोगबाग कोई भारत-पाकिस्तान-न्यूजीलैंड-ऑस्ट्रेलिया-इंग्लॅण्ड-जर्मनी के बीच खेले जा रहे क्रिकेट मैच नहीं देख रहे हैं कि अखबार वाले-टीवी वाले मृतकों का लेटेस्ट-स्कोर, रनिंग कमेंट्री दर्शकों को/पाठकों को बता रहे हों – चिल्ला-चिल्ला कर जैसे पूरा देश बहरा हो।
  • इंटरनेट पर अधिक खोजबीन करने से मानसिक-जनन-क्षमता नेश्तोनाबूद हो जायेगा। इसलिए “इंटरनेट का सेवन अधिक नहीं करें। यदि ऐसा करेंगे तो मानसिक रूप से पुरुषत्व और स्त्रीत्व क्षीण होता जायेगा। 

विपदा की स्थिति में, चाहे घर में विपदा आ गयी हो या मोहल्ले में, विपदा से गाँव ग्रसित हो गया हो या जिला, प्रदेश चपेट में आ गया हो या सम्पूर्ण राष्ट्र – सकारात्मक सोच में कमी नहीं आने दें। इसलिए वर्षों पहले देश के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी – जो आज कोरोना वॉयरस को हारने के लिए अर्जुन जैसा युद्ध कर रहे हैं – कहे थे: “सोच बदलो – देश बदलेगा” और देश सकारात्मक सोच से बदलता है, न की “नकारात्मक सोच से।

एक बात और: इन्टरनेट सकारात्मक कार्यों के लिए बना है। अगर आप इंटरनेट पर पालथी मारकर हमेशा बैठे रहेंगे तो यदि आप पुरुष है, तो आपका “पुरुषत्व” “वायरस के चपेट में आ जायेगा और अगर स्त्री हैं, तो आपका “स्त्रीत्व समाप्ति की ओर अग्रसर” – यानि मानसिक अपंगता के साथ-साथ शारीरिक बांझपन भी बढ़ेगा और कोरोना वायरस तो है ही।

बड़े-बुजुर्ग कहे थे अधिक ज्ञान होना अच्छी बात है लेकिन ज्ञान का खिचड़ी पकाना अच्छी बात नहीं है। पुराने  जमाने में किताबों, ग्रंथों को पढ़कर लोग-समाज ज्ञान अर्जित करता था, मेहनत कर ज्ञान प्राप्त करता था – इसलिए उन ज्ञानों पर संदेह करने की कोई गुंजाईश नहीं होता था।  आज के इंटरनेट के जमाने में बड़े-बड़े ज्ञानी-महात्मा, समाज के प्रवर्तकों का ज्ञान “तथाकथित” होता है जो समाज को रसातल की ओर उन्मुख कर रहा है। 

सत्तर के ज़माने में अख़बारों में, दूरदर्शन में  “सच” बोला जाता था, सच लिखा जाता था। उन्हें टी आर पी की चिंता नहीं होती थी।  समाचार पत्रों/टीवी के सम्पादकों पर राजनेताओं का अंकुश “नहीं के बराबर” होता था क्योंकि उस ज़माने के सम्पादकगण मूलतः सरस्वती के “गण” होते थे, न की “लक्ष्मी” के – वे “लोभी” तो नहीं ही होते थे (अपवाद छोड़कर), जबकि आज स्थिति पूर्णरूपेण विपरीत हैं। इसलिए सबसे अधिक ज्ञानी बनने का कोशिश कतई नहीं करें। स्वयं को “अफवाह वाले ज्ञान से अलग-थलग रखें, आईसोलेट रखें। आज-कल अख़बारों में जो पढ़ते हैं, टीवी पर जो देखते हैं; उसमें कितना सच है, आने वाली पीढ़ियां इसपर शोध करेगी। 

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कई लोगों का चरित्र होता है “नकारात्मक” रूप से ही सोच प्रारम्भ करना, सोचना। मसलन, अभी की स्थिति में जब सम्पूर्ण राष्ट्र, सम्पूर्ण विश्व कोरोना नामक वायरस से ग्रसित है, करोड़ों लोग, सिर्फ भारत में ही नहीं, विश्वभर में, सरकार द्वारा निकले गए आदेशों को ताक-पर रखकर मरने वालों की संख्या गिनते हैं और संवाद के अनेकानेक सूत्रों के माध्यम से विश्व भर में फैलाने में लगे हैं । 

भारत में ही देखिये, टीवी वाले, अखबार वाले समाज में जो सकारात्मक कार्य हो रहा है, युवक-युवतियां, बृद्ध, अनपढ़ लोग जिस तरह से समाज को एक सूत्र में बाँधने की अनवरत कोशिश कर रहे हैं, सकारात्मक कार्यों के द्वारा इस भयानक त्रादसी से निकलने की कोशिश कर रहे हैं – उसपर न लिखकर, उसे न दिखाकर, मृतकों का माथा गिन रहे हैं, कहाँ दाह-संस्कार होगा, कैसे होगा, कितनी लकड़ियां खरीदी जाएगी, समाज के किस-किस जाति के लोग उसके शव-यात्रा में शामिल होंगे – ब्रेकिंग न्यूज के रूप में, विशेषकर ओ वी वैन लगाकर दिखा रहे हैं – अब इन महात्माओं के अर्जित ज्ञान को क्या कहेंगे – ये समाज को भयभीत करने में अपनी अहम् भूमिका निभा रहे हैं। प्रधान मंत्री चाहे कितने ही सोच बदलने का नारा दें, अरबों, खरबों रुपये विज्ञापन पर खर्च करें, ऐसे ज्ञानी-महात्माओं-विद्वानों-विदुषियों का सोच कतई नहीं बदल सकता है। 

अरे भैय्या !! भारत के लोगबाग कोई भारत-पाकिस्तान, भारत-न्यूजीलैंड, भारत-ऑस्ट्रेलिया, भारत-इंग्लॅण्ड, भारत-जर्मनी के बीच खेले जा रहे क्रिकेट मैच नहीं देख रहे हैं कि अखबार वाले-टीवी वाले मृतकों का लेटेस्ट-स्कोर, रनिंग कमेंट्री दर्शकों को/पाठकों को बता रहे हों – चिल्ला-चिल्ला कर जैसे पूरा देश बहरा हो। 

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अस्सी के मध्य में भारत में एडुकेशनल रिसर्च नेटवर्क के रूप में इंटरनेट का अभ्युदय हुआ।  उसी वर्ष 64 kbit/s इंटनेट गेटवे मुंबई के एन सी एस टी से यूनाइटेड स्टेट के वर्जिनिआ से जोड़ा गया जो बाद में एन आई सी नेट के रूप में 1995 में सभी सरकारी संस्थाओं को एकबद्ध किया। इंटनेट के आगमन से यह सच है कि सम्पूर्ण विश्व की दूरी एक-ऊँगली के बराबर हो गयी – काफी फायदे हुए, एक क्रांति आयी। 

लेकिन भैय्या !! इंटरनेट पर अधिक जानकारी काहे एकत्रित करने में लगे रहते हो। इंटरनेट पर अधिक से, खोजबीन करने से मानसिक-जनन-क्षमता नेश्तोनाबूद हो जायेगा। उसी तरह जैसे बनारस में बड़े – बुजुर्ग कहते हैं: 

मर्दाना जाय खटाई से – जनाना जाय मिठाई से 

यानि, पुरुष यदि अत्यधिक खटाई का सेवन करेगा तो ”पुरुषत्व क्षीण” होगा और स्त्री यदि अत्यधिक मीठे का सेवन करेगी तो “स्त्रीत्व” और माहवारी आदि की समस्या से पीड़ित हो जाएगी – इसलिए “इंटरनेट का सेवन अधिक नहीं करें। यदि ऐसा करेंगे तो मानसिक रूप से पुरुषत्व और स्त्रीत्व क्षीण होता जायेगा। 

कई लोग इंटरनेट की बिमारी से, सोसल मिडिया नए-नए बच्चों (सोसल मिडिया के स्त्रोत) को अपना संतान से अधिक चाहते हैं। सुवह-सुवह पौ फटने से पूर्व बिछावन पर जगते ही, अपनी हथेलियों को देखने/चूमने, भगवान् को स्मरण करने, अपने पति/पत्नी/माता/पिता/संतानों के तरफ देखे बिना, खुश हुए बिना – खटाक से मोबाईल उठाते हैं, आँख मींचते हुए सोसल मिडिया पर पल्थी मार कर बैठ जाते हैं। पिछवाड़े से भुस्स – भुस्स करते रहते हैं, लेकिन एस एम एस करने, संवाद आगे प्रेषित करने, इंटरनेट से कट-पेस्ट करने लगते हैं – जैसे अपने अंतिम सांस लेते माता-पिता को जीवनदान दे रहे हों। 

अरे भैय्या !! यह बात आपको कोई डाक्टर नहीं बताएगा क्योंकि आज भारत में करोड़ों-करोड़ ऐसे डाक्टर हैं जो अपने-अपने क्लिनिक में, अपने-अपने अस्पताल (जहाँ नौकरी  नहीं, बल्कि अपने क्लिनिक में/निजी अस्पतालों में) सुवह-सुवह पूछकर ज्ञान प्राप्त करने में तनिक भी संकोच नहीं करते की “रात में कोई मरा या नहीं, बेड खाली हुआ या नहीं, कोई लाखों-रुपये वाला मरीज दाखिला लिया या नहीं) ?

बड़े-बुजुर्ग कहते हैं कि “इंटरनेट पर अधिक रहने से, ऐसे-ऐसे कार्य करने से रक्तचाप बढ़ता है, हड्डी से सम्बंधित अनेकानेक बीमारियां जन्म ले लेती है, दीर्घशंका (पैखाना)  दबाने से कब्जियत होने की सम्भावना प्रबल होती है, पेशाब रोकने से लीवर ख़राब होने की सम्भावना बहुत अधिक हो जाती है, समयांतराल मन कीच-कीच करने लगता है – यानि आ बैल मुझे मार। 

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इसलिए महाशय, मोदीजी के कार्यों में बिघ्न न डालें। उन्होंने जो २१-दिनों का लॉक डाउन रखा है, उसे पूर्णतः सफल होने में मदद करें। वे अकेला आदमी हैं फिर भी उन्हें चिंता है कि “आप जीवित रहें, स्वस्थ रहें, अपनी पत्नी, माता-पिता-बच्चों-समाज साथ जीवन भर, जीवन के अंतिम सांस तक मुस्कुराएं” – लेकिन आप लोग हैं की “वर्तमान स्थिति की भयावहता को समझ नहीं पा  रहे हैं।  इधर-उधर देखा और बीबी का हाथ पकड़कर घर से बाहर निकल पड़े, या फिर अपने प्रेमी-प्रेमिका और कार्यालय में काम करने वाले प्रेमी/प्रेयषी के गपियाने मोबाईल लेकर घर से बाहर निकल गए। 

अरे भैय्या !!! अगर मर-मुर गए तो अधिक से अधिक तीन घंटा मृत शरीर घर वाले घर में रहने देंगे, फिर दफना देंगे, अग्नि को सुपुर्द कर देंगे। आज आप कोरोना वायरस को तबज्जो नहीं देते, लेकिन आपके मृत शरीर से निकलने वाले वायरस से बचने के लिए आपके ही परिवार के जीवित लोग शीघ्रातिशीघ्र आपके मृत शरीर को अग्नि को सौंप देंगे।  समझे ?

इसलिए “झोलटंनपंथी” बंद करें, खुद अपने परिवार, माता-पिता के साथ घर के अंदर रहें। भजन सुनें, किशोर कुमार, मन्ना डे, लता मंगेशकर, मोहम्मद रफ़ी, आशा भोसंले, सोनू निगम, श्रेया घोसाल, उदित नारायण, अलका यागिनी, कुमार सानू, सुनिधि चौहान, ए आर रहमान, मुकेश, नेहा कक्कड़, शान, एस पी बालसुब्रमनियम, कविता कृष्णमूर्ति, यो यो हनीसिंह अरमान मल्लिक, अमिताभ बच्चन, सुखविंदर सिंह, अनुराधा पोडवाल, शंकर महादेवन, अभिजीत भट्टाचार्या, रेहत फतह अली खान अमित कुमार, मीका सिंह, हरिहरणं, येशुदास, कैलाश खेर, साधना सरगम, उषा ऊथ्थुप, जगजीत सिंह, परतं चक्रवर्ती, एस डी वर्मन, आर डी वर्मन, उषा उत्थुप, महेंद्र कपूर, हेमंत कुमार, सुरेश वाडेकर – जिनका भी गीत सुनना हो एक-बार नहीं हज़ारो बार सुनिए, हाथ एक  बार-बार धोइये, नकारात्मक सोच को हटाइये।  

लेकिन ध्यान रहे – दो काम नहीं करना है : एक: कनिका कपूर को न देखना है, न सुनना है और घर से बाहर निकलना ही नहीं है – नहीं तो कोरोना वायरस आपको दबोच लेगा। 

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